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जब आप हार जाना चाहते हैं

ज़िंदगी में कभी कभी आप हार जाना चाहते हैं। आप अच्छी तनख़्वाह वाली जॉब को पाने के सपने देखना छोड़ देते हैं, कॉलेज में उत्कृष्ट होने के सपने देखना छोड़ देते हैं, लोकप्रिय होने के सपने देखना छोड़ देते हैं या फिर उन चीज़ों के लिए लड़ना बंद कर देते हैं जिन चीज़ों को आप एक लंबे समय से पाना चाह रहे होते हैं।

हो सकता है कि आपने पूरी ज़िंदगी कड़ी मेहनत के द्वारा कुछ पाने की कोशिश की हो लेकिन एक ऐसा वक़्त आता है जबकि आप कहते हैं कि बस बहुत हो चुका, मैं थक गया हूँ। अब और नहीं।

बेड से उतरना जितना दिखता है उससे कई ज़्यादा मुश्किल होता है

मुझे लगता है कि मैं अपनी ज़िंदगी के उस बिंदु पर पहुँच गयी हूं जहाँ पर मैं ख़ुद से ये क्वेश्चन कर सकती हूँ कि मेरी ज़िंदगी में जितनी भी चीज़ें हैं उनकी क्या अहमियत है और जो आने वाली चीज़ें हैं उनकी क्या अहमियत होंगीं। हर सुबह मैं ये सोचते हुए उठती हूँ क्या मेरे प्रयासों की कोई अहमियत है? क्या मुझे वास्तव में दो काम करने चाहिए और एक अच्छी यूनिवर्सिटी में आने के लिए भरपूर मेहनत करनी चाहिए? पूरे दिन ये आसान होता है कि बेड से नीचे उतरकर इन सारी चीज़ों के बारे में सोचा जाए। लेकिन आज की बात थोड़ी सी अलग थी।

आज मैं अपने बेड पर प्रतिदिन की अपेक्षा काफ़ी देर तक लेटी रही। ज़रा सोचिए वो औरत जिसे छः बजे तक बेड पर रहने तक से नफ़रत थी वो आज दोपहर एक बजे तक बेड पर लेटी रही। ईमानदारी से कहूं तो मेरी बेड पर से उठने की ताक़त ख़त्म हो चुकी थी, मुझ में ख़ुद के सपनों और उम्मीदों को और ज़्यादा आगे बढ़ाने की ताक़त नहीं बची थी और जिन लोगों और चीज़ों को मैं अपनी ज़िंदगी में देखना चाहती थी उनके लिए लड़ने की ताक़त भी अब मुझमें नहीं बची थी। मैं अपने अस्तित्व को एक दिन के लिए लगाम देना चाहती थी।

संभलना और गिर जाना

जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, मैंने हद से ज़्यादा तीव्र और झकझोर देने वाली भावनाओं का अनुभव किया है।मैंने बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा किया है। मैंने अपनी गलतियों पर कई बार पछताए किए हैं और मैंने अपने अंदर बहुत से दुःख समेटे हैं, ये चीज़ें ऐसी हैं जो आपको ग़ौर करने पर मजबूर करती हैं। आज सुबह जब मैं उठी, जो चीज़ मैंने ख़ुद से पूछी वो ये थी कि मैं इन चीज़ों को किस तरह संभाल सकती हूँ। मैं किसी पल को भरपूर तरह से कैसे जी सकती हूँ और कभी किसी वक़्त मेरे जीवन में चीज़ें थीं उनके बारे में सोच कर किस तरह ख़ुश हो सकती हूँ? सबसे महत्वपूर्ण चीज़ कि मैं लोगों से आशा करना किस तरह बंद करूं, यहाँ तक कि ख़ुद से भी?

सफलता और अर्थ

इंसान होने के नाते हम अक्सर चीज़ें पाना चाहते हैं या जो भी हम करते हैं उसका मूल्य खोजना चाहते हैं। हर बार जब हम कोई काम करते हैं तो हम उसका एक सफल परिणाम पाना चाहते हैं; हम क्लास में प्रथम आना चाहते हैं, काम के दौरान मेडल जीतना चाहते हैं, सोशल मीडिया पर एक नए ट्रेंड की शुरुआत करना चाहते हैं।

लेकिन क्या हो जब एक दिन इन सारी चीज़ों का कोई महत्व न रहे? और क्या हो कि आपने अब तक अपनी ज़िंदगी में जो भी चीज़ें की हैं आप उनकी कोई पहचान ढूँढना ना चाहें? क्या वो चीज़ें जो आप रोज़ करते हैं उनका कोई महत्व रहेगा? क्या चीज़ों में अर्थ और सफलता की चाह को खोजना छोड़ देने से आपकी अस्त व्यस्त ज़िंदगी में बदलाव आएगा? सबसे महत्वपूर्ण चीज़ कि क्या आप कम चिंतित और कम निराश महसूस करेंगे?

किसी दिन मुझे सारे जवाब मिल जाएँगे

मेरे पास इन सारे सवालों के जवाब अब तक नहीं हैं। और जैसे जैसे मैं लिखती जा रही हूँ मुझे महसूस हो रहा है कि मेरे पास सवालों की संख्या और ज़्यादा बढ़ती जा रही है जिनमें से कुछ के ही जवाब मेरे पास हैं। अगर मैं क़िस्मत की धनी रही तो शायद मुझे दिन ख़त्म होने से पहले ही सारे सवालों के जवाब मिल जाएँ। और अगर मैं क़िस्मत की धनी ना भी हुई तो कल फिर मैं अपने बेड पर थोड़ी और देर के लिए लेटूँगी और ये उम्मीद करूँगी कि वे सवाल जो मुझे अभी ख़ुद से पूछने हैं उनके जवाब मुझे जल्द ही मिल जाएंगे।