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स्वर्गरोहिणी चोटी: गढ़वाल हिमालय उत्तराखंड- स्वर्ग की सीढ़ी

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क्या आप भी उन लोगों में से हैं, जैसे कि मैं, जो किसी स्थान पर सिर्फ़ घूमना ही नहीं बल्कि उस जगह के इतिहास के बारे में जानना भी पसंद करते हैं? यदि हॉं तो यह लेख आपके लिए काफ़ी रोचक हो सकता है! मैं ऐसा इंसान हूँ जो किसी स्थान पर घूमने के दौरान या घूमने जाने से पहले उसके बारे में पढ़ना पसंद करता है। मुझे उस जगह के महत्व के विषय में जानना और ख़ासकर के मुझे वहाँ के मिथ्यों और मश्हूर कहानियों के बारे में जानने का काफ़ी शौक़ है।


भारत के प्रत्येक स्थान जहाँ पर हम घूमने जाते हैं, उनमें बहुत जादू और रहस्य है।

 

 

एक दिग्गज चीज़ है जिसके विषय में आपने अवश्य सुना होगा। यदि आपने कभी भी हिमालय की यात्रा की है तो आपको स्वर्गरोहिणी के विषय में अवश्य पता होगा। इसके पीछे एक कहानी है, जो स्वर्ग की सीढ़ी के विषय में है।

 

स्वर्गरोहिणी वो पर्वत शृंखला है जो उत्तराखंड में स्थित है। ये चार चोटियों का एक समूह है जिनमें सबसे ज़्यादा महत्व इसी को प्राप्त होता है। महाभारत में इसे दिव्य चरित्र (लीजेंड) कहा गया है और काफ़ी लोगों के द्वारा भी इसे दिव्य चरित्र ही कहा जाता है।

 


 

दिव्य चरित्र

कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडव भाइयों और उनकी पत्नी द्रोपदी ने संन्यास लेने का निश्चय किया। संन्यास लेने के लिए आवश्यक सभी प्रकार के कर्मकांड करने के बाद उन्होंने अपना राज्य छोड़ दिया और संन्यास लेने के लिए चले गए। उनकी यात्रा काफ़ी मुश्किल थी क्योंकि उनको असल में महान हिमालय की गोद में पहुँचना था। उन्हें इस बात का थोड़ा बहुत ज्ञान अवश्य था कि ये उनकी आख़िरी यात्रा होगी।


 


 
एक एक करके सातों लोगों का ये समूह धीरे धीरे छोटा होने लगा। केवल धर्मराज को छोड़कर बाक़ी सभी लोग अपने द्वारा किए गये पापों के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गए। सबसे पहले अर्जुन से अत्यधिक लगाव रखने के कारण द्रोपदी की मृत्यु हो गई। उनके बाद सहदेव अपने गर्व के कारण मारे गए। अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण नकुल का देहान्त हुआ, अर्जुन की मृत्यु घमण्ड और भीम की मृत्यु लालच के कारण हुई। इस तरह एक एक करके सभी लोग धरती में समा गए।

आख़िर में सिर्फ़ धर्मराज ही अकेले ज़िंदा बचे थे। जैसे ही वे अपने कुत्ते के साथ आगे बढ़े, ठीक उसी समय उनकी मुलाक़ात भगवान इन्द्र से हो गई। घोड़ा गाड़ी हीरों से भरी हुई थी और वह उनका इंतज़ार कर रही थी ताकि उन्हें स्वर्ग की ओर ले जाया जा सके। लेकिन धर्मराज ने मना कर दिया। वे स्वर्ग कैसे जा सकते थे जबकि उनका परिवार उनके साथ स्वर्ग में नहीं जा रहा था।

भगवान इन्द्र में उन्हें भरोसा दिलाया कि उनका पूरा परिवार सुरक्षा से स्वर्ग में पहुँच चुका है लेकिन उन सबको अपने शरीर को पृथ्वी पर ही छोड़ना पड़ा। उन सभी में से अकेले वे ही ऐसे थे जो स्वर्ग में अपनी यात्रा अपने शरीर के साथ करने वाले थे।एक लंबी बातचीत के बाद, धर्मराज ने अपने मानव शरीर के साथ स्वर्ग जाने लिए हामी भरी।
 


 

तीर्थ यात्रा

ऐसा माना जाता है कि अपने मानवीय शरीर के साथ स्वर्ग जाने का इकलौता रास्ता स्वर्गरोहिणी पर्वत श्रृंखला ही है। साधु और संत अपनी वर्षों की तपस्या का शुभारंभ इस पर्वत पर स्थित बद्रीनाथ मंदिर में करते हैं। वे लुभावने और मनमोहक स्थानों से होकर गुज़रते हैं और जगह जगह पर रुकते भी हैं।
 


 

 


 
वह उन स्थानों पर भी रुकते हैं जहाँ पर धर्मराज के परिवार के प्रत्येक सदस्य ने अपनी मृत्यु को प्राप्त किया था, वे आनंदवन और वसुंधरा जैसी ऐसी चरागाहों पर भी रुकते हैं जहाँ का पानी पापियों पर कभी नहीं गिरता। वे लक्ष्मीवन में भी रुकते हैं जहाँ पर सनौबर के पेड़ उगते हैं जिनका प्रयोग प्राचीन काल में लेखन कार्य में किया जाता था।
 


 

 


 
साधुओं को एक ऐसी लंबी रोड से होकर गुज़रना होता है जो बेहद मनमोहक दृश्यों से हो कर गुज़रती है। उन्हें शास्त्र धारा से होकर भी गुज़रना पड़ता है जहाँ पर अनेक झरने मौजूद है। वे चक्रतीर्थ गुफा और सतोपथ झील से होकर गुज़रते हैं और उसके बाद अंत में वे स्वर्गरोहिणी की तरफ़ बढ़ते हैं।
 
किवदंती कहते हैं कि स्वर्ग के लिए कुल सात चरण होते हैं। लेकिन बर्फ़ की चादर होने के कारण उसमें से सिर्फ़ तीन को ही देखना संभव हो पाता है।
 

ये स्वर्गरोहिणी की कहानी है। याद रखें अगली बार जब आप हिमालय पर्वत पर घूमने जाएं तो आपको ये तय कर लेना चाहिए कि आप स्वर्ग की सीढ़ियाँ अवश्य देखेंगें।